Famous Author
Deo Kumar
Mr. Deo Kumar
Author and Independent Researcher
Secretary
Karam Foundation, Ranchi
Director
Success Made Easy, Ranchi
Mr. Deo Kumar belongs to Ormanjhi, Ranchi, Jharkhand. He is an alumnus of prestigious centrally funded engineering institute "National Institute of Advanced Manufacturing Technology, Ranchi". He has imparted training at Usha Martin Limited, Ranchi and Tata Motors Ltd, Jamshedpur and worked with leading organizations like Adhunik Group of Industries, Society for Integrated Social Upliftment and Jharkhand State Livelihood Promotion Society (JSLPS) under the aegis of Rural Development Department, Government of Jharkhand. After having decade of managerial rank experience in various organisation, he has turned his Career in Authorpreneurship. He is famous author as various books mentioned his name in famous category. He is author of Birhor-Hindi-English Dictionary forwarded by Dr. M.K. Gautam (Vice - Chancellor, European University of West and East, Netherlands) and Dr. Netra P. Paudyal ( Research Scholar, Kiel University, Germany). He has done marvelous work for preservation of mother tongue of Particularly Vulnerable Tribal Group (Birhor). He is also working on next awaited Jharkhand General Knowledge book "Mai Hoo Jharkhand " which will release soon.

Mr. Deo Kumar has completed Master of Business Administration (Human Resource Management) from Ranchi University, Ranchi. Prior to that he has completed Engineering from premier Institute "National Institute of Advanced Manufacturing Technology" (NIAMT), Ranchi. He has imparted training in leading organizations like Tata Motors Ltd, Jamshedpur and Usha Martin Ltd, Ranchi. He was associated with Adhunik Group of Industries as an Engineer. Recently, he was holding the post of Block Program Manager,JSLPS under the aegis of Rural Development Department, Government of Jharkhand. He has participated in various National and International Seminars.

Book

बिरहोर-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश तीन भाषाओं में चित्रों के माध्यम से बिरहोर समुदाय के बच्चों को मातृभाषा बोलने में प्रोत्साहित करने का माध्यम है। इसमें दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली शब्दावलियों का समावेश किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy), 2020 में मातृभाषाओं के विकास पर अधिकत्तम बल दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (UNESCO), पेरिस द्वारा बिरहोर भाषा को गंभीर खतरे की भाषा में शामिल किया गया है एवं संयुक्त राष्ट्र महासंघ ने 2022-32 को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा के दशक के रूप में घोषित करने का संकल्प अपनाया है। ऐसे में इस पुस्तक की व्यापकता और भी बढ़ जाती है। यह शब्दकोश बिरहोर समाज के उत्थान हेतु प्रयासरत प्रोफेशनलों द्वारा स्थानीय भाषा में संवाद स्थापित करने के लिए मील का पत्थर साबित होगी।

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Mr. Deepak Saval
Deo Kumar
Mr. Deepak Saval
Author
दीपक सवाल बोकारो जिला के कसमार प्रखंड के निवासी हैं। वह देश के सुप्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार हैं। उन्होंने छात्र जीवन में ही दैनिक 'प्रभात खबर', रांची से आंचलिक पत्रकारिता की शुरुआत की और कुछ वर्षों में ही अपनी जमीनी पत्रकारिता से अलग पहचान बनाई। इस दौरान अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी इनके आलेख प्रमुखता से छपते रहे। वर्ष 2000 में दैनिक 'हिंदुस्तान' से जुड़े और बोकारो कार्यालय में बतौर संवाददाता कार्य करते बोकारो की पत्रकारिता में एक खास नाम बनकर उभरे। इस बीच दैनिक 'खबर मंत्र' में भी बतौर चीफ रिपोर्टर करीब एक वर्ष तक कार्य किया। संप्रति दैनिक 'प्रभात खबर' में बतौर संवाददाता कार्यरत हैं। कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तरीय के पत्रकार संगठनों से भी जुड़े हैं। इनमें विशेष तौर पर 'बेरमो अनुमंडल संवाददाता संघ' (सचिव), 'बोकारो जर्नलिस्ट एसोसिएशन' (सचिव), 'अखिल भारतीय पत्रकार संघ' (झारखंड राज्य सचिव) तथा 'ऑल इंडिया रिपोर्टर एसोसिएशन' (पश्चिम बंगाल राज्य उपाध्यक्ष) शामिल है। प्रारंभिक जीवन से सामाजिक गतिविधियों में भी इनकी काफी दिलचस्पी रही है। कई सामाजिक संस्था-संगठनों से जुड़कर प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर सामाजिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन बखूबी करते रहे हैं। इन्हें बोकारो खोरठा कमेटी द्वारा 'खोरठा रत्न' तथा रेलवे के महिला संगठन समेत अन्य संगठनों के द्वारा भी उत्कृष्ट पत्रकारिता व लेखन के लिए सम्मानित किया गया है।
प्रमुख कृतियां
  • तालाब झारखंड (वर्ष 2005 में प्रकाशित शोध पुस्तक)
  • त्रासदी विस्थापन की (वर्ष 2006 में विस्थापन की समस्या पर शत पुस्तिका)
  • मैं बोकारो ... (वर्ष 2007 में प्रकाशित लेखक की सबसे चर्चित पुस्तक)
  • मैं बोकारो ... वर्ष 2010 में प्रकाशित द्वितीय संस्करण)
  • झारखंड आंदोलन और कसमार (वर्ष 2011 में प्रकाशित झारखंड आंदोलन में कसमार की भूमिका को टटोलती पुस्तिका)
  • शिवपुर गाथा (वर्ष 2019 में सिंहपुर के ऐतिहासिक शिवालय व मंडा पर्व पर आधारित पुस्तिका)
  • जरा याद इन्हें भी कर लो... (वर्ष 2019 में स्वतंत्रता आंदोलन व गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों पर केंद्रित पुस्तक)
  • गुदड़ी के लाल (वर्ष 2019 में प्रकाशित)
  • कल्पतरु (वर्ष 2019 में प्रकाशित)
  • एक और अयोध्या ...अयोध्या पहाड़ (2020 में प्रकाशित यह पुस्तक पश्चिम बंगाल के अयोध्या पहाड़ पर केंद्रित है)
  • मददगार मुरारका (2021 में प्रकाशित यह पुस्तक चास-बोकारो के चर्चित समाजसेवी गोपाल मुरारका के सेवमुखी कार्यो पर केंद्रित है)
Mr. Binay Kumar Tewary
Deo Kumar
Mr. Binay Kumar Tewary
Author
देश-विदेश में चर्चित खोरठा लोक गीत के महानायक विनय तिवारी : - एक दृष्टि में

नाम: विनय कुमार तिवारी
जन्म: 5 अक्टूबर, 1974
पिता का नाम: श्री हरि प्रसाद तिवारी
माता का नाम: स्व0 बेला रानी
जन्म स्थान: ग्राम - रोआम, पोस्ट - रोआम, ( पिनकोड - 828113),पंचायत- ढांगी।
प्रखण्ड: तोपचाँची, जिला - धनबाद, राज्य- झारखण्ड (भारत)।संपर्क नम्बर- 9334345097.
शिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा (अर्थशास्त्र)।
कला क्षेत्र: गीत , कविता और पटकथा लेखन।
भाषा: खोरठा (झारखण्ड राज्य की सबसे बड़े क्षेत्र और आबादी की लोकभाषा)।

उपलब्धियाँ
सम्मान/उपाधि/पुरस्कार:
  • झारखंड सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन द्वारा साल 2008 में ’खोरठा गौरव अवार्ड से सम्मानित।
  • नेट इंडिया सुविधा कार्ड्स लिमिटेड कंपनी के द्वारा खोरठा रत्न सम्मान।
  • श्री मथुरा प्रसाद महतो खाद्य आपूर्ति एवं भू .राजस्व मंत्री झारखंड सरकार द्वारा बर्ष 2011 में खोरठा गीत संगीत एवं सिनेमा के क्षेत्र में योगदान हेतु खोरठा सम्मान से सम्मानित।
  • श्री निवास पानुरी स्मृति सम्मान एवं श्री निवास पानुरी खोरठा प्रबुद्व सम्मान से सम्मानित।
  • ऋषिकेश स्मारक सेवा समिति द्वारा खोरठा गीत सम्मान से सम्मानित।
  • प्रथम झारखंड अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में " श्री निवास पानुरी मेमोरियल अवार्ड फॉर खोरठा लिटरेचर "सम्मान से सम्मानित।
  • झारखंड फिल्म निर्माता संघ द्वारा झारखंड कला रत्न सम्मान से सम्मानित।
  • प्रथम झारखंड नेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट गीतकार ऑफ खोरठा सम्मान से सम्मानित।
  • ऋषिकेश स्मारक सेवा समिति द्वारा खोरठा श्री सम्मान।
  • द्वितीय झारखंड नेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट स्क्रिप्ट राइटर ऑफ खोरठा सम्मान से सम्मानित।
  • आधुनिक एवं अति लोकप्रिय खोरठा गीत लेखन तथा खोरठा गीत संगीत सिनेमा के विकास में विशिष्ट योगदान हेतु खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद द्वारा खोरठा कला संस्कृति रत्न सम्मान से सम्मानित।
  • आधुनिक गीत,संगीत,एवं सिनेमा में विशेष योगदान के लिए " जागो जगाओ सांस्कृतिक कला मंच द्वारा अखड़ा सम्मान से सम्मानित।
  • नमन इंटरनेशनल फाउंडेशन फ़ॉर एडुकेशन एंड सोशल रिसर्च द्वारा " नमन बिरसा मुंडा झारखण्ड रत्न सम्मान से सम्मानित।
  • खोरठा गीत-संगीत-सहित्य व सिनेमा के प्रचार प्रसार विकास संरक्षण-संवर्धन व आंदोलन के लिए अनेकों प्रशासकों, समाज सेवियों-जनप्रतिनिधियों व संस्थाओं द्वारा प्रशस्ति पत्रों एवं सम्मानों से सम्मानित।
  • खोरठा गीत-संगीत-सहित्य व सिनेमा के प्रचार प्रसार विकास संरक्षण-संवर्धन व आंदोलन के लिए अनेकों प्रशासकों, समाज सेवियों-जनप्रतिनिधियों व संस्थाओं द्वारा प्रशस्ति पत्रों एवं सम्मानों से सम्मानित।
"हज़ारो साल अपनी बेनूरी पर रोती है जब नर्गिस
तब जाकर चमन पर आता है दीदावर कोई।"
इकबाल का यह शेर पता नहीं किसके लिए कहा गया था। पर इसका निहितार्थ झारखंड के सबसे बड़े क्षेत्र और सबसे बड़ी आबादी की मातृभाषा "खोरठा" पर भी लागू होता है। खोरठा भी अपनी पहचान के लिए सदियों से तरस रही थी, उपेक्षा और तिरस्कार की पीड़ा झेल रही थी। इसके महत्व की चमक (नूर) से दुनिया बेखबर थी। ऐसे में हजारो बरस बाद इसे पहचान कर दुनिया के सामने इसकी खूबियों को रखनेवाले पिछली सदी में पैदा हुए थे। इन्हीं में से एक दीदावर का नाम है विनय कुमार तिवारी। जिन्होंने खोरठा गीत-संगीत-सिनेमा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य कर खोरठा भाषा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है।

श्री विनय कुमार तिवारी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित प्रकार है -
  • आधुनिक खोरठा गीत-संगीत-सिनेमा के अग्रदूत:

    देश का अठाइसवाँ राज्य - झारखंड प्रजाति, प्रकृति और विविध भाषा-संस्कृति के संदर्भ में एक अनूठा प्रदेश है। यहाँ तीन प्रजाति के मानव समुदायों द्वारा तीन वर्ग की भाषाएँ बोली जाती है। आग्नेय, द्रविड़ और आर्य परिवार की एक दर्जन से अधिक भाषाओं का प्रचलन है जो झारखण्ड की मूल भाषाएँ हैं। जिनमें से सबसे बड़े क्षेत्र में, सबसे बड़ी आबादी की भाषा है " खोरठा "। यह एक प्राचीन भाषा होने के साथ ही काफी समृद्ध भी है। झारखण्ड के 24 में-से 16-17 जिलों में खोरठा भाषी बसे हुए हैं जिनकी संख्या डेढ़ करोड़ के आसपास मानी गई है। 2011 की जनगणना के आँकड़ों को माने तो खोरठा बोलनेवाले 84 लाख हैं। यह पारंपरिक लोकभाषा यहाँ के गैर- जनजाति और जनजाति की मातृभाषा होने के साथ ही दो तिहाई भाषा-भाषी समुदाय के बीच की पारंपरिक संपर्क भाषा है। समृद्ध लोक साहित्य की पृष्ठभूमि में इस भाषा में लगभग तीन सौ साल पहले साहित्य लेखन शुरू हुआ था, पर छिट-पुट रूप में। बीती सदी के उत्तरार्द्ध में इसके साहित्य लेखन में गति आई। और अबतक दो सौ से अधिक साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। इसके साथ ही पिछले चालीस से अधिक वर्षों से अकादमिक स्तर से मान्यता प्राप्त है और 2011 से झारखण्ड राज्य में द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है।

    पर, इसके बावजूद खोरठा एक उपेक्षित भाषा थी। अपनी स्वतंत्र भाषिक पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी। कुछ साहित्यकार खोरठा में रचनाएँ कर खोरठा को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए काफी प्रयास कर रहे थे। लेकिन उनकी पहुँच कुछ पढ़े-लिखे लोगों तक ही सिमट कर रह गई थी। अकादमिक स्तर पर तो 1981-82 में राँची विश्वविद्यालय से एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दे दी गई थी, पर आम जनता में खोरठा को लेकर बहुत ही हीन भावना थी। इसे अनपढ़-गवाँरों की बेढंगी, खुरदरी भाषा माना जाता था। स्वयं खोरठा भाषी भी अपनी भाषा को लेकर काफी हीन भावना के शिकार थे। वे अपनी भाषा का नाम लेने में संकोच करते थे। पढ़े-लिखे लोग तो अपनी मातृभाषा के रूप में खोरठा को स्वीकारना भी पसंद नहीं करते थे। खोरठा का लोक संगीत कुछ पर्व त्योहारों और कुछ सांस्कारिक अनुष्ठानों तक ही सिमट कर रह गया था। इसकी सैकड़ों किस्म की कर्णप्रिय लोकधुनें धीरे-धीरे विलुप्त हो रही थीं। कुछ साहित्यकार और लोक चेतना संपन्न कुछ कलाकार एक पुरानी पर जीवंत लोकभाषा के उपादानों के अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

    इन निराशाजनक परिस्थितियों से खोरठा गीत संगीत को गुमनामी के गर्त से निकालकर नई पहचान के शिखर पर आरूढ़ कराने के लिए एक विलक्षण प्रतिभा संपन्न कलाकार के रूप में खोरठा जगत में विनय कुमार तिवारी का प्रादुर्भाव होता है। इन्होंने खोरठा गीत-संगीत को आधुनिक समाज और संदर्भ से जोड़कर इस ढंग से प्रस्तुत किया कि आम खोरठाभाषी ही नहीं, बल्कि गैर- खोरठा भाषियों में खोरठा गीतों का जादू सर चढ़कर बोलने लगा। विनय कुमार तिवारी के लिखे और इन्हीं की बनाई धुनों से सजे गीतों ने गजब की धूम मचाई। जमाना टेप रिकाॅर्डर के कैसेटों का था। खोरठा गीत-संगीत में एक क्रांति आ गई। खुशियों के मौकों पर अब फिल्मी गानों की जगह खोरठा गीतों ने ले ली। विनय जी के पीछे-पीछे खोरठा गीतकारों की एक बड़ी जमात पैदा होने लगी। तरह-तरह के खोरठा गीतों के एलबम लोगों के बीच आने लगे। लेकिन सर्वाधिक लोक-स्वीकृति, विनय जी की गीत रचनाओं को मिली। सिर्फ खोरठा भाषी क्षेत्र या झारखण्ड ही नहीं, बल्कि बिहार, बंगाल,उडीसा, असम, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भी तिवारी जी के गीतों ने अभूतपूर्व लोकप्रियता का परचम लहराया। जिस खोरठा नाम से खोरठा भाषी भी परिचित नहीं थे उसे राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाने लगा। जिसका सर्वाधिक श्रेय निर्विवाद रूप से विनय कुमार तिवारी जी को जाता है।

  • असाधारण प्रतिभा संपन्न गीतकार :

    विनय कुमार तिवारी एक असाधारण प्रतिभाशाली गीत रचनाकार हैं। इनके गीतों में जीवन की सतरंगी छटा के दर्शन होते हैं। सरल-सहज शब्दों में भाव-विषयों की इतनी सुंदर प्रस्तुति की जाती है कि सुननेवाले के दिल में सीधे उतर जाते हैं। आपके गीत युवा दिलों को धड़काते हैं, बजुर्गों को रिझाते हैं तो महिलाओं को ममता और करुणा से भर देते हैं।

  • बॉलीवुड के शीर्ष गायकों द्वारा गाया गया विनय के गीत:

    प्रसिद्ध गीतकार विनय जी के बहुआयामी गीतों का विशाल भंडार है। अबतक आपने एक हजार से अधिक खोरठा गीतों की रचना की है। जो अलग-अलग भाव-विषय के हैं। अधिकतर रोमांटिक और भक्ति भाव पर आधारित हैं। जिनमें से अधिकांश सुपर-डुपर हिट हुए हैं। इनकी गीतों की लोकग्राह्यता को देखकर टी सिरिज़ कैसेट कंपनी ने इन्हें अपने लिए लिखने के लिए अनुबंध किया और अनेक हिट एलबम बाजार में छोड़े, जो कैसेट के जमाने से लेकर आज यूट्यूब और सोशल मीडिया के नवयुग में भी काफी लोकप्रिय हैं। इनके गीतों को स्थानीय कलाकारों के अलावा बाॅलीवूड के कुमार शानु, उदित नारायण,सपना अवस्थी और भजन सम्राट अनुप जलोटा जैसे विख्यात कलाकारों ने अपनी आवाजें दी हैं।

    खोरठा में इनके गीतों की धूम के चलते इन्हें लोग खोरठा का ‘समीर’ कहकर पुकारते हैं।

    खोरठा के अतिरिक्त भोजपुरी और नागपुरी भाषाओं में इन्होंने गीत लिखे हैं जिन्हें लोगों ने काफी पसंद किया है। एक अति लोकप्रिय गीतकार के रूप में इनके साक्षात्कार कई टीवी चैनलों, आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं में प्रसारित-प्रकाशित हुए हैं। जिनमें ई टीवी बिहार, आकाशवाणी राँची और झारखंड सरकार की ऐतिहासिक पत्रिका ‘आदिवासी’ उल्लेखनीय है।

    इन्होंने अनेक सामाजिक विषय के गीतों की रचना की है। जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं/संकलनों में प्रकाशित होकर चर्चित हैं। जिनमें से ‘एइ भात रे’ शीर्षक गीत को काफी सराहा गया है। आपके कई गीत रचनाएँ विश्वविद्यालय के खोरठा पाठ्यक्रम में शामिल हैं।

    झारखंड की सातवीं कक्षा के पाठ्यक्रम हमारी विरासत में ‘झारखण्ड की संस्कृति’ पाठ के अंतर्गत झालीवुड झारखंड का सिनेमा में आपके लिखे खोरठा फिल्मों का जिक्र किया गया है। इसके अलावा आपके रचनाओं पर शोधार्थियों द्वारा शोध किया गया है और साथ ही आपके उत्कृष्ट रचनाओं पर शोध किया जा रहा है।

  • खोरठा गीत-संगीत एवं सिनेमा के उन्नायक:

    विनय कुमार तिवारी जी ने जिस प्रकार आधुनिक खोरठा गीत-संगीत को लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाने में अग्रणी भूमिका निभाई वहीं खोरठा में सिनेमा निर्माण को भी शुरूआत दी। इन्होंने खोरठा फिल्मों के लिए गीत के अलावे पटकथा और संवाद की भी रचना की है। खोरठा फिल्म ‘हामर देहाती बाबू में पटकथा लेखन, खोरठा फिल्म ‘देय देबो जान गोरी’ में गीत लेखन, नागपुरी फिल्म ‘करमा’ में गीत लेखन, खोरठा शार्ट फिल्म ‘पिता का मान बेटियाँ’ में पटकथा व निर्देशन, खोरठा फिल्म ‘झारखंडेक माटी’ में गीत लेखक की भूमिका निभाई। ‘पिता का मान बेटियाँ’ शार्ट फिल्म को झारखंड राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ खोरठा फिल्म के पुरस्कार से नवाजा गया है।

  • खोरठा भाषा साहित्य संगीत सिनेमा के हक एवं अधिकार के लिए संघर्षशील:

    खोरठा साहित्य गीत-संगीत, सिनेमा और साहित्यकार-कलाकारों के हक लिए विनय जी ने हमेशा संघर्ष किया है। कई बार आंदोलन किए। सरकार से पत्राचार किया। मीडिया के माध्यम से आवाजें उठाईं। जो आज भी जारी है।

  • मृदुभाषी, विनम्र एवं कोमल हृदय के धनी व्यक्तित्व:

    विनय कुमार तिवारी बड़े विनम्र स्वभाव के सौम्य-शालीन मृदुभाषी मिलनसार व्यक्ति हैं। एक गीतकार के रूप में सफलता की बुलंदियों पर पहुँचने के बावजूद आपमें इसका लेशमात्र अहंकार नहीं है। आपके मृदुल व्यवहार से कोई अनजान भी अपनत्व का भाव पाता है।

  • कठिन त्याग एवं संघर्ष से मिली सफलता :

    विनय जी को कामयाबी और शोहरत का यह मुकाम आसानी से नहीं मिल गया। यहाँ तक पहुँचने में काफी संघर्ष और चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्में , एक किरानी के तीसरे पुत्र विनय जी को अपने गीत-संगीत से बचपन से रुचि थी, जिसे उन्होंने एक आयाम देने का ठाना। अपनी मातृभाषा में गीत कविताएँ लिखने लगे। स्नातक प्रतिष्ठा करने बाद भी किसी सेवा के लिए तैयारी करने की बजाए खोरठा गीत-संगीत को एक नई पहचान दिलाना ही जीवन लक्ष्य बना लिया। इसके लिए उन्हें परिवार और समाज से विरोध का सामना करना पड़ा था। लोगों ने काफी उपहास भी उड़ाया। संघर्ष के दौरान काफी आर्थिक संकट से जूझना पड़ा था। किंतु दृढ़ निश्चयी विनय जी विचलित नहीं हुए। सारी चुनौतियों से लड़ते हुए अपनी धुन में आगे बढ़ते गये। कुछ ही वर्षों में उनके जुनून ने रंग लाया। अलोचकों की जुबाँ पर ताला लगा। प्रशंसकों की संख्या लाखों में नहीं करोड़ो में हो गई। आधुनिक खोरठा गीतों के पर्याय बन गए। चाहनेवालों उन्हें अपने दिलों में बिठा लिया। सफलता का शिखर उनके कदम चूमने लगा। आधुनिक खोरठा गीत-संगीत और सिनेमा के सफर में पचीस वर्षों से लगातार चलते हुए एक अथक राही के तौर आज भी अपने कदमों को आगे के पड़ावों के लिए बढ़ाते जा रहे हैं। खोरठा गीत-संगीत सिनेमा को राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाने और सही हक दिलाने के लक्ष्य के आप निरंतर संघर्षशील हैं और हजारों के प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।


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